फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की सबसे खूबसूरत गजलें

Faiz Ahmad faiz birth anniversary: फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ सबसे प्रसिद्ध, प्रख्यात और क्रांतिकारी शायरों में से एक थें. वे अपनी बेबाक अंदाज के कारण आज भी लोगों में बेहद मकबूल और मशहूर हैं. फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने आधुनिक उर्दू शायरी को विश्व मंच पर पहचान देने का काम किया. यही वजह है कि उनका नाम गालिब, मीर और इकबाल जैसे महान शायरो के साथ लिया जाता है. वे सरहदों, जबानों, विचारधाराओं और मान्यताओं की हर सीमा को तोड़ने में कभी पीछे नहीं रहें. आज उनकी यौमे पैदाइश है. आईये उनकी सबसे खूबसूरत गजलों को पढ़ते हैं.

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की मशहूर गजलें-

1.

कब ठहरेगा दर्द ऐ दिल कब रात बसर होगी

सुनते थे वो आएँगे सुनते थे सहर होगी.

कब जान लहू होगी कब अश्क गुहर होगा

किस दिन तिरी शुनवाई ऐ दीदा-ए-तर होगी.

कब महकेगी फ़स्ल-ए-गुल कब बहकेगा मय-ख़ाना

कब सुब्ह-ए-सुख़न होगी कब शाम-ए-नज़र होगी.

वाइ'ज़ है न ज़ाहिद है नासेह है न क़ातिल है

अब शहर में यारों की किस तरह बसर होगी.

कब तक अभी रह देखें ऐ क़ामत-ए-जानाना

कब हश्र मुअ'य्यन है तुझ को तो ख़बर होगी.

2.

दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के

वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के.

वीराँ है मय-कदा ख़ुम-ओ-साग़र उदास हैं

तुम क्या गए कि रूठ गए दिन बहार के.

इक फ़ुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन

देखे हैं हम ने हौसले पर्वरदिगार के.

दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया

तुझ से भी दिल-फ़रेब हैं ग़म रोज़गार के.

भूले से मुस्कुरा तो दिए थे वो आज 'फ़ैज़'

मत पूछ वलवले दिल-ए-ना-कर्दा-कार के.

3.

''आप की याद आती रही रात भर''

चाँदनी दिल दुखाती रही रात भर.

गाह जलती हुई गाह बुझती हुई

शम-ए-ग़म झिलमिलाती रही रात भर.

कोई ख़ुशबू बदलती रही पैरहन

कोई तस्वीर गाती रही रात भर.

फिर सबा साया-ए-शाख़-ए-गुल के तले

कोई क़िस्सा सुनाती रही रात भर.

जो आया उसे कोई ज़ंजीर-ए-दर

हर सदा पर बुलाती रही रात भर.

एक उम्मीद से दिल बहलता रहा

इक तमन्ना सताती रही रात भर.

4.

गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले

चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले.

क़फ़स उदास है यारो सबा से कुछ तो कहो

कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले.

कभी तो सुब्ह तिरे कुंज-ए-लब से हो आग़ाज़

कभी तो शब सर-ए-काकुल से मुश्क-बार चले.

बड़ा है दर्द का रिश्ता ये दिल ग़रीब सही

तुम्हारे नाम पे आएँगे ग़म-गुसार चले.

जो हम पे गुज़री सो गुज़री मगर शब-ए-हिज्राँ

हमारे अश्क तिरी आक़िबत सँवार चले.

हुज़ूर-ए-यार हुई दफ़्तर-ए-जुनूँ की तलब

गिरह में ले के गरेबाँ का तार तार चले.

मक़ाम 'फ़ैज़' कोई राह में जचा ही नहीं

जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले.

2024-02-13T10:23:31Z dg43tfdfdgfd